भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के जनक, स्वराज्य की माँग रखने वाले और कांग्रेस की उग्र विचारधारा के समर्थक बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को रत्नागिरि जिले के चिकल गाँव तालुका में हुआ था। इनके पिता का नाम गंगाधर रामचन्द्र पंत व माता का नाम पार्वती बाई गंगाधर था। कहते हैं कि इनकी माता पार्वती बाई ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से पूरे अश्विन महीने (हिन्दी कलैण्डर का महीना) में निर्जला व्रत रखकर सूर्य की उपासना की थी, इसके बाद तिलक का जन्म हुआ था। इनके जन्म के समय इनकी माता बहुत दुर्बल हो गयी थी। जन्म के काफी समय बाद ये दोनों स्वस्थ्य हुये।
बाल गंगाधर तिलक के बचपन का नाम केशव था और यही नाम इनके दादा जी (रामचन्द्र पंत) के पिता का भी था इसलिये परिवार में सब इन्हें बलवंत या बाल कहते थे, अतः इनका नाम बाल गंगाधर पड़ा। इनका बाल्यकाल रत्नागिरि में व्यतीत हुआ। बचपन में इन्हें कहानी सुनने का बहुत शौक था इसलिये जब भी समय मिलता ये अपने दादाजी के पास चले जाते और उनसे कहानी सुनते। दादाजी इन्हें रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे, गुरु नानक, नानक साहब आदि देशभक्तों और क्रान्तिकारियों की कहानी सुनाते थे। तिलक बड़े ध्यान से उनकी कहानियों को सुनकर प्रेरणा लेते। इन्हें अपने दादाजी से ही बहुत छोटी सी उम्र में भारतीय संस्कृति और सभ्यता की सीख मिली। इस तरह प्रारम्भ में ही इनके विचारों का रुख क्रान्तिकारी हो गया और ये अंग्रेजों व अंग्रेजी शासन से घृणा करने लगे।
पारिवारिक परिवेश और प्रारम्भिक शिक्षा
तिलक का जन्म एक सुसंस्कृत, मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनका परिवार चितापावन वंश से संबंधित था जो सभी धार्मिक नियमों और परंपराओं का कट्टरता से पालन करते थे। इनके पिता, गंगाधर रामचन्द्न पंत रत्नागिरि में सहायक अध्यापक थे। इनके पिता अपने समय के लोकप्रिय शिक्षक थे। गंगाधर रामचन्द्न पंत ने त्रिकोणमिति और व्याकरण पर अनेक पुस्तकें लिखी जो प्रकाशित भी हुई।
इनकी माता, पार्वती बाई धार्मिक विचारों वाली महिला थी। इनके दादा जी स्वंय महा-विद्वान थे। उन्होंने बाल को बचपन में भारतीय संस्कृति, सभ्यता, परम्पराओं और देशभक्ति की शिक्षा दी। अपने परिवार से बाल्यकाल में मिले संस्कारों की छाप तिलक के भावी जीवन में साफ दिखाई पड़ती हैं।
तिलक के पिता ने घर पर ही इन्हें संस्कृत का अध्ययन कराया। जब बाल तीन साल के थे तब से ये प्रतिदिन संस्कृत का श्लोक याद करके 1 पाई रिश्वत के रुप में लेते थे। पाँच वर्ष के होने तक इन्होंने बहुत कुछ सीख लिया था। इन्हें 1861 में प्रारम्भिक शिक्षा के लिये रत्नागिरि की मराठी पाठशाला में भेजा गया।
इनके पिता ने इन्हें शुरु से ही आत्मनिर्भर रहने के साथ ही साथ धैर्य और सहनशीलता की शिक्षा भी दी। बाल्यकाल में परिवार से मिली शिक्षाओं के कारण जीवन के हर मोड़ पर इन्होंने धैर्यपूर्वक कार्य किया। जिसने इनके चरित्र को और भी अधिक उज्जवल कर दिया और इन्हें लोकमान्य के नाम से जाना जाने लगा।
पूना में बाल गंगाधर तिलक
1866 में गंगाधर रामचन्द्र पंत (तिलक के पिता) का तबादला पूना हो जाने के कारण तिलक परिवार के साथ पूना आ गये। इस समय इनकी उम्र 10 वर्ष की थी। इनके पूना आने पर इनके दादा जी सन्यास लेकर काशी चले गये, जिनसे इनकी मुलाकात फिर कभी नहीं हुई। पूना में इन्हें आगे की पढ़ाई के लिये एंग्लों वर्नाक्यूलर स्कूल में भर्ती कराया। यहाँ आने के बाद गंगाधर तिलक का एक नया ही रुप समाने आया। 1866 में पूना स्कूल में पढ़ते हुये तिलक ने 2 सालों में 3 श्रेणियों को पूरा किया था।
यहाँ आने के कुछ ही महीने बाद इनकी माँ की मृत्यु हो गयी। 10 साल की छोटी सी उम्र में ही इनके सर से माँ का ममता भरा हाथ उठ गया। नन्हें तिलक को उनकी चाची ने अपने ममता भरे आँचल में ढक लिया और इन्हें माँ का प्यार और स्नेह दिया।
पूना के विद्यालय में बाल गंगाधर तिलक
पूना के स्कूल में पढ़ते समय तिलक के व्यक्तित्व का एक नया ही रुप सामने आया। इनके विद्यार्थी जीवन की ऐसी अनेक घटनाएँ हैं जिन्होंने बचपन में ही ये स्पष्ट कर दिया था कि ये बालक न तो कभी अपने ऊपर हो रहे अन्याय सहेगा और न ही किसी और के ऊपर हो रहे अन्याय को चुपचाप देखेगा। इन घटनाओं ने तिलक को न्यायप्रियता, निर्भीक, जिद्दी स्वभाव, सत्यवादिता और अपने उसूलों पर कायम रहने वाला सिद्ध कर दिया।
तिलक के विद्यार्थी जीवन की अनेक घटनाओं में से कुछ निम्न हैं:
“एक बार बाल का मन चौपड़ खेलने को कर रहा था, लेकिन उनके साथ खेलने के लिये कोई भी दूसरा साथी नहीं था। अतः उन्होंने खम्भें को अपना दूसरा साथी बना लिया और दाँये हाथ (सीधे) से खम्भें के पासों को ड़ालते और बाँये हाथ से अपने पासों को फेंकर खेलने लगे। इस तरह खेलते हुये ये दो बार हार गये। इनकी दादी दूर बैंठी हुई इन्हें ऐसे खेलते हुये देख रहीं थी। तिलक को खम्भें से हारते हुये देखकर हँसते हुये बोली, ‘अरे बेटे गंगाधर! तुम एक खम्भे से हार गये।’ दादी की बात सुनकर गंगाधर ने बड़ी सौम्यता से कहा, ''हार गया तो क्या हुआ, मेरा दायां हाथ खंभे की तरफ था और मुझे दाएं हाथ से खेलने की आदत है। इसलिए खंभा जीत गया और मैं हार गया।”
“एक बार इनकी क्लास के कुछ विद्यार्थियों ने मूँगफली खाकर मूँगफली के छिलके क्लास में ही फेंक दिये जब इनके अध्यापक ने क्लास को गंदा देखा तो पूरी क्लास को दंडित करने लगे। जब शिक्षक ने उन्हें भी दंड देने के लिये हाथ आगे करने को कहा तो तिलक ने दंड स्वीकार करने से मान कर दिया और इन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘जब मैंने क्लास को गंदा नहीं किया हैं तो दंड क्यों स्वीकार करूँ।’ इस बात को सुनकर अध्यापक ने इनके पिता को सूचना दी। स्कूल की सारी घटना को सुनकर इनके पिता ने शिक्षक से कहा कि मैंने अपने बेटे को कुछ भी खरीदने के लिये रुपये नहीं दिये और न ही मेरा बेटा झूठ बोलता हैं, न ही बाजार की कोई चीज खाता हैं।”
बाल गंगाधर तिलक अपने जीवन में कभी भी अन्याय के सामने नहीं झुके। उस दिन अगर शिक्षक के डर से तिलक ने स्कूल में मार खा ली होती तो शायद उनके अंदर का साहस बचपन में ही समाप्त हो जाता।
“लोकमान्य तिलक बचपन से ही बहुत साहसी और निडर थे। गणित और संस्कृत उनके प्रिय विषय थे। स्कूल में जब उनकी परीक्षाएं होतीं, तब गणित की परीक्षा में ये हमेशा कठिन सवालों को हल करना ही पसंद करते थे।
इनकी इस आदत के बारे में इनके एक मित्र ने कहा कि तुम हमेशा कठिन सवालों को ही क्यों हल करते हो? अगर तुम सरल सवालों को हल करोगे तो तुम्हें परीक्षा में ज्यादा अंक मिलेंगे। इस पर तिलक ने जवाब दिया कि मैं ज्यादा-से-ज्यादा सीखना चाहता हूँ, इसलिए कठिन सवालों को हल करता हूँ। अगर हम हमेशा ऐसे काम ही करते रहेंगे, जो हमें सरल लगते हैं तो हम कभी कुछ नया नहीं सीख पायेंगे। यही बात हमारी जिंदगी पर भी लागू होती है, अगर हम हमेशा आसान विषय, सरल सवाल और साधारण काम की तलाश में लगे रहेंगे तो कभी आगे नहीं बढ़ पाएंगे।”
कुशाग्र (तेज) बुद्धि के स्वामी
तिलक बचपन से ही पढ़ने में तेज थे। इन्हें जब भी कुछ याद करने को दिया जाता ये उसे इतने अच्छे से याद करते कि कभी भूलते नहीं थे। जब इन्होंने हाई स्कूल में प्रवेश लिया तो देखा कि इन्हें आधे से ज्यादा पाठ्यक्रम पहले से ही याद था। एक बार इनके अध्यापक क्लास में नैषध काव्य की व्याख्या करा रहे थे। उन्होंने देखा कि तिलक उस व्याख्या को नहीं लिख रहे हैं। अध्यापक ने जब इनसे पूछा कि तुम व्याख्या क्यों नहीं कर रहे तो इन्होंने निड़रता से उत्तर दिया कि ये इसकी और भी बेहतर व्याख्या स्वंय कर सकते हैं जो इनकी ज्यादा मदद करेंगी।
14 वर्ष की छोटी सी उम्र में ही इनकी अंग्रेजी और संस्कृत पर अच्छी पकड़ थी। इनके पिता संस्कृत में इनके कविता लिखने की शैली के साथ ही अंग्रेजी, संस्कृत, मराठी और हिन्दी भाषा के इनके ज्ञान को देखकर खुद बहुत आश्चर्यचकित थे।
बाल गंगाधर का विवाह और पिता की मृत्यु
तिलक की माता जी की मृत्यु के बाद से इनके पिता अस्वस्थ्य रहने लगे थे। उस समय भारत में बाल विवाह की परम्परा थी। इसलिये इनके पिता ने भी 15 वर्ष की आयु में इनका विवाह गांव की भोली-भाली सीधी सी लड़की तापी से करा दिया। तापी की उम्र विवाह के समय केवल 10 साल की थी। जब इन दोनों की शादी हुई इन्हें शादी का सही अर्थ भी नहीं मालूम था, बस जानते थे तो इतना कि ये एक ऐसे बंधन में बंध गये हैं जिसे कभी न तो तोड़ा जा सकता हैं न भूला जा सकता हैं।
शादी के कुछ समय दिनों बाद तापी आगे की पढ़ाई करने के लिये अपने माता-पिता के पास आ गयी। शादी के बाद तापी का नाम बदलकर सत्यभामा रख दिया गया। बाल गंगाधर तिलक की शादी के बाद से इनके पिता के स्वास्थ्य में निरन्तर गिरावट होती रही। इनकी शादी के 1 साल बाद पिता की मृत्यु हो गयी। 16 वर्ष की अवस्था में तिलक अनाथ हो गये। इनके पिता की मृत्यु के बाद एक अभिभावक की सारी जिम्मेदारियों का निर्वहन इनके चाचा-चाची ने किया।
उच्च शिक्षा व कॉलेज का जीवन
अपने पिता की मृत्यु पर बाल गंगाधर तिलक को गहरा सहमा लगा। पिता की मृत्यु के समय तिलक मैट्रिक की पढ़ाई कर रहे थे। इन्होंने बहुत साहस के साथ अपने आप को संभाला और पिता की मृत्यु के 4 महीने के बाद मैट्रिक की परीक्षा पास की। 1872 में मैट्रिक पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिये इन्होंने डेक्कन कॉलेज में प्रवेश लिया। प्रारम्भ में तिलक कॉलेज 5 मील पैदल चलकर जाते थे लेकिन बाद में ये कॉलेज के छात्रावास में रहने लगे।
इनकी चाची इन्हें अपने पुत्र की तरह प्रेम करती थी। गंगाधर तिलक के छात्रावास में रहने के निर्णय पर ये चिन्तित हो गयी कि कहीं ब्रिटिश संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाला ये कॉलेज इनके भतीजे को भी अपने रंग में न रंग ले। लेकिन तिलक ने कभी कोई ऐसा कार्य नहीं किया जिससे इनके परिवारजनों को कभी लज्जित होना पड़े। ये वहाँ हमेशा सादा रेशमी धोती पहनकर रहते थे और पलभर के लिये भी इन्होंने भारतीय संस्कृति को नहीं छोड़ा। छात्र जीवन में तिलक ने हमेशा सादा जीवन व्यतीत किया। किसी भी तरह के दिखावे और फैशन का इन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
तिलक ने जिस समय कॉलेज में प्रवेश लिया था ये उस समय बहुत दुर्बल शरीर वाले थे। अपने शरीर को हृष्ट-पुष्ट करने के लिये ये प्रतिदिन नियम से व्यायाम करते थे। कुश्ती, तैराकी, नौकायान इनके प्रिय खेल बन गये। ये कई-कई घंटों तक पानी में तैरते रहते थे। कॉलेज जीवन में एक साल के अन्दर ही तिलक का शरीर मजबूत और आकर्षक हो गया।
तिलक ने 1873 में डेक्कन स्कूल में प्रवेश लिया। यहाँ से इन्होंने 1876 में बी.ए. आनर्स प्रथम श्रेणी से पास किया इसके बाद 2 साल में एल.एल.बी. किया। तिलक गणित में बहुत अच्छे थे। जब ये कानून की पढ़ाई कर रहे थे तब एक शिक्षक ने इनसे पूछा कि गणित का का इतना अच्छा ज्ञान होते हुये कानून की पढ़ाई करने का निर्णय क्यों लिया। इस पर तिलक ने सहजता से जबाव दिया, “गणित में उच्चशिक्षा प्राप्त करके अच्छी नौकरी मिल सकती है, लेकिन कानून की पढ़ाई करने से देश सेवा को भलीभाँति किया जा सकता है।”
बाल गंगाधर तिलक का विद्यार्थी जीवन या तिलक एक विद्यार्थी के रुप में
तिलक पढ़ते समय बहुत गहनता से पढ़ते थे। जब भी ये किसी विषय को पढ़ते तो उस विषय की जड़ तक पहुँचकर उसका अध्ययन करते थे। उस विषय से संबंधित अनेक पुस्तकों को सन्दर्भ के रुप में पढ़ते थे। इनका उद्देश्य उस विषय को अच्छे से समझना होता था न कि पढ़कर केवल अच्छे अंक (नम्बर) प्राप्त करना।
एकबार तिलक महारानी मैरी और महारानी एलिजाबेथ के शासन काल को पढ़ रहे थे। अपनी पाठ्यपुस्तक को एक तरफ रखकर इन्होंने उस से संबंधित अनेक सन्दर्भों को पढ़ा और अलग से उस विषय पर एक बिल्कुल नया पाठ लिख लिया।
बाल गंगाधर तिलक अधिकतर सब के सोने के बाद पढ़ते थे और पूरी रात अध्ययन करते हुये बिता देते थे। ये बहुत स्पष्ट वादी थे। इनके मन में जो भी आता ये साफ शब्दों में कह देते थे। इनके सहपाठी इसी आदत के कारण इन्हें ‘मि.ब्लंट’ कहते थे। व्यायाम करने के बाद इनकी शरीरिक शक्ति बढ़ गयी थी जिससे इनके साथी इन्हें ‘मि.डेविल’ भी कहते थे।
तिलक के बारे में कहा जाता हैं कि ये केवल अपने कोर्स में निर्धारित किताबों को पढ़कर संतुष्ट नहीं होते थे। ये अधिकतर “कैम्ब्रिज मैथमेटिकल जनरल” में प्रकाशित होने वाले गणित के सवालों को हल करते थे।
तिलक के शिक्षकों के साथ संबंध
बाल गंगाधर तिलक अपने विद्यार्थी जीवन में हर चीज के बारे में गहन अध्ययन करते थे। उस पर पूर्ण रुप से चिन्तन मनन करने के बाद ही तथ्यों को स्वीकार करते थे। जब भी इनके सामने किसी प्रश्न से ऐसी कोई दुविधा उत्पन्न होती जिसका ये समाधान कर पाने में असमर्थ होते तो उस प्रश्न का समाधान अपने अध्यापकों से करते थे और जब तक शिक्षक के जबावो से पूरी तरह सन्तुष्ट नहीं होते तब तक उनसे तर्क करते रहते थे। गंगाधर की इस आदत के कारण इनके शिक्षक इनकी आलोचना करते थे और कई शिक्षकों के ये प्रिय छात्र बन गये। तिलक के प्रिय शिक्षकों में प्रोफेसर छत्रे, विलियम वर्ड्सवर्थ (प्रसिद्ध इंग्लिश कवि विलियम वर्ड्सवर्थ के पौते) और प्रो. शूट शामिल थे।
तिलक अपने गणित के प्रोफेसर केरुमन छात्रे के बहुत करीब थे। तिलक एक ऐसे विद्यार्थी थे जिसकी चाह हरेक शिक्षक को होती हैं और दूसरी ओर प्रोफेसर छात्रे खुद अपने विषय के महापंड़ित माने जाते थे। तिलक जब स्कूल के विद्यार्थी थे तब अक्सर जिन प्रश्नों से ये अपने क्लास के शिक्षकों से असहमत होते थे, उन समस्याओं और प्रश्नों को हल करने के लिये प्रो. छत्रे के पास आते थे। बाद में एक कॉलेज छात्र के रुप में तिलक ऐसे जटिल सवालों को हल करते और पूछते थे जो शिक्षक को भी सोचने पर मजबूर कर दें।
तिलक के गुणों ने प्रों. छत्रे को बहुत प्रभावित किया और ये उनके सबसे प्रिय छात्र बन गये। प्रोफेसर छत्रे तिलक जैसे अनोखे मौलिक विचारों वाले शिष्य को पाकर स्वंय को गौरवाविंत महसूस करते थे। तिलक का प्रोफेसर छत्रे के साथ बहुत गहरा रिश्ता था। ये अपने शिक्षक छत्रे को बहुत मानते थे। छत्रे जी की मृत्यु के बाद इन्होंने उनके सभी अधूरे कार्यों को पूरा करके उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी थी।
प्रोफेसर छत्रे के अतिरिक्त ऐसे अन्य शिक्षक भी थे जिन्होंने तिलक के जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। इनमें प्रो. विलियम वड्सवर्थ और प्रो. शूट मुख्य रुप से शामिल थे। इन्होंने विलियम वड्सवर्थ से इंग्लिश लिटरेचर और प्रो. शूट से इतिहास और राजनीतिक अर्थशास्त्र का अध्ययन किया था।
सरकारी नौकरी न करने का निर्णय
कॉलेज में तिलक की मुलाकात गोपालराव आगरकर, खरे और अप्पा साहेब शारंगपणि से हुई। इनसे मुलाकात मित्रता में बदल गयी। आगरकर और तिलक ने अपने देश की सेवा करने के उद्देश्य से जीवन भर सरकारी नौकरी न करने का प्रण लिया। तिलक डबल ग्रेजुएट थे, यदि चाहते तो आसानी से कोई भी सरकारी नौकरी कर सकते थे लेकिन इन्होंने अपनी पहली प्राथमिकता देश सेवा को दी और सरकार के अधीन कोई भी पद ग्रहण नहीं किया।
भारत की तत्कालीन परिस्थितियों पर तिलक के विचार और सुधार के उपाय
तिलक जब मात्र 1 साल के थे, वो समय भारतीय के लिये ऐतिहासिक क्षण था। भारत की आजादी के लिये पहला भारतीय विद्रोह हुआ, जिसे 1857 की क्रान्ति के नाम से जाना जाता है। हांलाकि उस समय तिलक बहुत छोटे थे परन्तु इस क्रान्ति ने उनके बाल मन पर अमिट छाप छोड़ी। तिलक के दादाजी रामचन्द्र पंत ने इन्हें इस क्रान्ति में भाग लेने वाले स्वतन्त्रता सेनानियों की कहानी सुनाकर इनके हृदय में देशभक्ति की लौ प्रज्वलित कर दी। इन सब परिस्थितियों ने बालकाल में ही इन में एक चिन्तक के गुणों को जाग्रत कर दिया।
तिलक ने देश की तत्कालीन परिस्थितियों पर बहुत गहरा चिन्तन किया। इन्होंने महसूस किया कि यदि देश को गुलामी की वर्तमान अवस्था से बाहर निकालना है तो इसके लिये भारत की शिक्षा पद्धति में सुधार करना आवश्यक है, क्योंकि अंग्रेजों द्वारा जिस पद्धति के आधार पर भारतियों को शिक्षा दी जा रही है वो केवल इतनी ही है जिससे कि अंग्रेज हम पर लम्बें समय तक शासन कर सके।
तिलक ब्रिटिश प्रेरित भ्रष्ट और मूर्ख बनाने वाली शिक्षा के भारतीय मस्तिष्क पर पड़ने वाले प्रभावों से पूरी तरह परिचित थे। इनका मानना था कि ब्रिटिशों द्वारा दी जाने वाली शिक्षा पूर्व व पश्चिम की नस्लवादिता पर आधारित थी। इसलिये इन्होंने सबसे पहले राष्ट्रीय शिक्षा पर बल दिया। एक सम्मानित शिक्षाविद् के रुप में प्रसिद्ध महादेव गोविन्द रानाडे का भी यहीं मानना था कि देश को जब तक आजाद नहीं कराया जा सकता जब तक कि इसके पास अमेरिका की तरह राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति और राष्ट्रीय प्रेस न हो।
न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना (जनवरी 1880)
1876 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने बी.ए. की डिग्री प्राप्त की और इसके बाद देशसेवा में अपना योगदान देने के उद्देश्य से 1879 में एल.एल.बी. की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली। वकालात की डिग्री प्राप्त करने के बाद ये और इनके सहयोगी मित्र गोविन्दराव आगरकर पूरी तरह से देश-सेवा के क्षेत्र में उतर गये। यद्यपि आगरकर का मानना था कि सबसे पहले धर्म और घर परिवार की स्थिति में सुधार करना चाहिये अर्थात् वो समाज सुधार को प्राथमिकता देना चाहते थे। वहीं तिलक का मानना था कि यदि लोगों को शिक्षित किया जाये तो वो समाज सुधार में अधिक सहायक होगें।
राष्ट्रीय शिक्षा की योजना को कार्यान्वित करने के लिये धन की आवश्यकता थी। इसके लिये जन-धन का प्रबंध करने का निश्चय किया गया। इसी बीच इनकी मुलाकात विष्णु शास्त्री चिपलूणकर से हुआ। चिपलूणकर मराठी के प्रसिद्ध लेखक थे। 1873 में इन्हों सरकारी शिक्षक के रुप में नौकरी कर ली। इसी बीच इनके मन में अपने देश के युवाओं के हृदय में राष्ट्रीय चेतना जगाने की इच्छा हुई, जिसके लिये ये एक विद्यालय खोलना चाहते थे। जब गंगाधर तिलक ने इन्हें अपनी राष्ट्रीय शिक्षा योजना के बारे में बताया तो ये तुरन्त मदद करने के लिये तैयार हो गये।
इस तरह तिलक ने आगरकर, चिपलूणकर, एम.बी. नामजोशी के सहयोग से जनवरी 1880 को पहले प्राइवेट स्कूल “न्यू इंग्लिश स्कूल” की स्थापना की। इस स्कूल के संस्थापकों की प्रतिष्ठा के कारण आस-पास के जिलों के विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया। प्रराम्भिक वर्षों में स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या 336 थी जो अगले 5 सालों में बढ़कर 1900 हो गयी। चिपलूणकर और तिलक दोनों ही धार्मिक थे लेकिन स्कूल के पाठ्यक्रम में कोई भी धार्मिक विषय शामिल नहीं किया गया। ये दोनों ही चाहते थे कि देश का प्रत्येक वर्ग (बच्चे, युवा, वृद्ध सभी) देश की वर्तमान परिस्थितियों को जाने। इस स्कूल ने पूना की सांस्कृतिक और राजनैतिक परिस्थितियों में एक नया इतिहास रचा था।
न्यू इंग्लिश स्कूल का शिक्षण विभाग और डेक्कन एजूकेशन सोसायटी की स्थापना (1885)
तिलक ने न्यू इंग्लिश स्कूल के शिक्षक का कार्यभार एल.एल.बी. करने के बाद 1880 में संभाल लिया। इसके बाद 1881 में आगरकर ने एम.ए. करने के बाद शिक्षण विभाग में शामिल हो गये। न्यू इंग्लिश के सबसे पहले शिक्षण विभाग में निम्नलिखित लोग शामिल थे –
  • वी.के.चिपलूणकर
  • एम.बी.नामजोशी
  • वी.एस.आप्टे (एम.ए.)
  • जी.जी.आगरकर (एम.ए.)
  • वी.बी.केलकर (बी.ए.)
  • एम.एस.गोले (एम.ए.)
  • एन.के.धर्प (बी.ए.)
  • लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक (बी.ए. एल.एल.बी.)
बाल गंगाधर तिलक और इनके साथी (चिपलूणकर, आगरकर, नामजोशी, केलकर आदि) ने पहले साल संस्था में बिना किसी वेतन, पारिश्रमिक के बच्चों को शिक्षित किया। 1882 में विलियम हंटर की अध्यक्षता में एजुकेशन कमीशन ने बंबई प्रेजीडेंसी में आये तो न्यू इंग्लिश स्कूल के कार्यकर्ताओं ने उनके मस्तिष्क पर बहुत गहरा प्रभाव छोड़ा। इस स्कूल के कार्यकर्ताओं के कार्य से इतने प्रभावित हुये कि उन्होंने भारतियों की उच्च शिक्षा के लिये कॉलेज स्थापित करने के लिये भी प्रेरित किया। सर विलियम हंटर ने न्यू इंग्लिश स्कूल की शिक्षा प्रणाली से प्रभावित होकर टिप्पणी की थी :
“इस विद्यालय की प्रगति देखते हुये मैं निश्चित होकर कह सकता हूँ कि पूरे भारत में इसकी बराबरी करने वाला एक भी स्कूल मेरी नजर में नहीं आया। बिना किसी सरकारी सहायता लिये ये स्कूल सरकारी हाई स्कूल की न केवल बराबरी करेगा बल्कि उससे प्रतियोगिता भी कर सकता हैं। यदि हम दूसरे देशों के स्कूलों से इसकी तुलना करें तो भी ये ही प्रथम आयेगा।”
1880 में ये तिलक और उनके मित्र सहयोगियों द्वारा उठाया गया क्रान्तिकारी कदम था क्योंकि उस समय केवल इसाई मिशनरी और सरकारी संस्थाएँ ही लोगों को शिक्षित करने का काम करती थी जो एक राष्ट्र के स्वराज्य के रुप में औद्योगिक उत्थान के लिये नेतृत्व की क्षमता का विकास करने में बिल्कुल विफल साबित हो रहीं थी। उस समय शिक्षा के क्षेत्र में निजी संस्थाओं को हतोत्साहित किया जाता था। ऐसे समय में तिलक ने शिक्षा के माध्यम से देशवासियों की बुद्धिमत्ता, गिरती दृढ़ इच्छा और सोयी हुई अन्तःचेतना को जगाने के लिये प्रयास किया और जिसके परिणाम स्वरुप डेक्कन एजुकेशन सोसायटी अस्तित्व में आयी। 13 अगस्त 1885 में डेक्कन एजुकेशन सोसायटी को सोसायटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम XXI, 1860 के अन्तर्गत पंजीकृत किया गया।
तिलक एक शिक्षक के रुप में
न्यू स्कूल की स्थापना के बाद तिलक के व्यक्तित्व का एक नया रुप सामने आया। तिलक स्कूल में गणित, संस्कृत और इंग्लिश पढ़ाते थे। इन्होंने कमजोर विद्यार्थियों के लिये अलग से पढ़ाना शुरु कर दिया। जो विद्यार्थी क्लास में पढ़ाई गये विषय को ठीक से समझ नहीं पाते थे तिलक उनकी अलग से अतिरिक्त क्लास लेते थे। तिलक हमेशा उन छात्रों की मदद के लिए उपस्थित रहते थे जो अपने सन्देहों और समस्याओं (पाठ्यक्रम से संबंधित समस्या) को सुलझाने के लिये उनके पास जाते थे।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की एक अजीब आदत थी। ये गणित पढ़ाते समय सवालों को मौखिक हल करते थे। ये कभी भी सवाल का हल ब्लैकबोर्ड (श्यामपट) पर नहीं लिखते थे, जिसका परिणाम ये होता था कि केवल वही छात्र इनकी रफ्तार को पकड़ पाते थे जो गणित में विशेष रुचि रखते थे। गणित के अतिरिक्त तिलक संस्कृत भी पढ़ाते थे।
तिलक किसी भी विषय की बुनियादी शिक्षा देते थे जो छात्रों को विषय को गहराई से समझने के लिये प्रोत्साहित करती थी। संस्कृत के श्लोकों को पढ़ाते समय ये छात्रों को समझाते थे कि कैसे एक संस्कृत श्लोक से दूसरे की उत्पति होती है। अंग्रेजी पढ़ाते समय ये एक-एक शब्द की व्याख्या न करके एस साथ एक पैराग्राफ का सार समझाते थे।
पत्रिकाओं के माध्यम से जन-जागृति की नयी पहल
बाल गंगाधर तिलक जन-साधारण की बेबसी से बहुत अच्छा तरह से परिचित थे। लेकिन जब इन्होंने बड़ौदा के महाराज मल्हार राव को भी अंग्रेज सरकार के सामने बेबस देखा तो इन्हें बहुत बड़ा धक्का लगा। ब्रिटिश सरकार ने महाराज मल्हार राव पर अभियोग लगाया कि इन्होंने रेजीडेंट कर्नल फेयर को जहर देने की कोशिश की हैं। इस अभियोग की जाँच के लिये सरकार ने कमीशन नियुक्त जिसमें इन्हें दोषी ठहराकर राज्य से वंचित कर दिया और सारी सम्पत्ति भी जब्त कर ली। दूसरी घटना दिल्ली दरबार में घटित हुई जिससे ये बिल्कुल साफ हो गया कि अंग्रेज भारतियों के लिये क्या सोचते हैं।
1877-78 में एक ओर तो भारत में भयंकर अकाल के कारण लोग भूखे मर रहे थे, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिशों ने दिल्ली में दरबार लगाकर ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया को ‘केसर-ए-हिन्द’ की उपाधी देकर भारत की साम्राज्ञी घोषित किया। अंग्रेजों के इस कार्य से भारतीयों के मन में क्रोध भर गया। जिसके परिणामस्वरुप महाराष्ट्र में बलवंत फाकड़े के नेतृत्व में विद्रोह हुआ। इस क्रान्तिकारी विद्रोह को अंग्रेजों ने अपना दमन नीति से विफल कर दिया।
इन तीन प्रमुख घटनाओं ने तिलक को देश के स्वराज्य प्राप्ति के लिये नये सिरे से सोचने पर विवश कर दिया। बलवंत फाकड़े के क्रान्तिकारी विद्रोह का परिणाम ये स्वंय देख चुके थे। अतः एक बात तो स्पष्ट हो गयी थी कि सिर्फ क्रान्ति के द्वारा ही अंग्रेजों की गुलामी से आजादी नहीं पायी जा सकती। इसके लिये लोगों को देश की वास्तविक परिस्थितियों से परिचित कराना अति आवश्यक हैं। अतः तिलक ने पत्र प्रकाशन करके लोगों को जागरुक करने का लक्ष्य बनाया।
न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना करके तिलक ने देश के युवाओं को शिक्षित करके देश के भविष्य निर्माण के कार्य को शुरु कर दिया था। इसके बाद देश की तत्कालीन परिस्थितियों से देशवासियो को अवगत कराने और अपने राष्ट्रवादी कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिये तिलक ने अपने साथियों चिपलूणकर, नामजोशी और आगरकर के साथ समाचार पत्र निकालने का विचार किया। तिलक के साथी इनके इस विचार से सहमत हो गये और शीघ्र अति शीघ्र इस कार्य को शुरु करने के लिये तैयार हो गये।
1881 में समाचार पत्र के प्रकाशन के लिये आर्यभूषण प्रेस खरीदा गया। इस प्रेस में चिपलूणकर की निबंध-माला प्रकाशित होती थी। निबंध-माला के 66वें अंक में लोगों को सूचना दी गयी कि ‘केसरी’ और ‘मराठा’ दो समाचार पत्रों का प्रकाशन किया जायेगा। इसी अंक में इन दो समाचार पत्रों के प्रकाशन की नियमावली भी प्रकाशित की गयी।
‘ केसरी’ और ‘मराठा’ समाचार पत्रों का घोषणा पत्र और इनका उद्देश्य
तिलक के सहयोगियों चिपलूणकर, आगरकर, गर्दें और बी.एम. नामजोशी के संयुक्त हस्ताक्षरों के साथ ‘केसरी’ का घोषणापत्र प्रकाशित किया। इस घोषणा पत्र में कहा गया था कि इसमें अन्य पत्रों की भाँति समाचार, राजनीतिक घटनाएँ, व्यापार के साथ ही सामाजिक विषय पर निबंध, नयी पुस्तकों की समीक्षा और इंग्लैंण्ड की नयी राजनीतिक घटनाओं की भी चर्चा की जायेगी।
इस घोषणा पत्र ने ये साफ कर दिया थे कि ये दोनों समाचार पत्र अन्य पत्रों की तरह प्रचलित शासन व्यवस्था की चापलूसी नहीं करेगें। इन दोनों पत्रों की विषय सामग्री एक ही थी। अन्तर केवल इतना था कि ‘केसरी’ पत्र मराठी भाषा में प्रकाशित होता था और ‘मराठा’ पत्र अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित किया जाता था। इन दोनों पत्रों का एकमात्र उद्देश्य देशवासियों में स्वाधीनता की भावना का विकास करना था।
अपने इसी उद्देश्य को सार्थक करते हुये ‘मराठा’ का पहला अंक 2 जनवरी 1881 को और ‘केसरी’ का पहला अंक 4 जनवरी 1881 को प्रकाशित किया गया। ‘केसरी’ पत्र के सम्पादन का कार्य गंगाधर तिलक करते थे और आगरकर ‘मराठा’ के सम्पादक के रुप में कार्य करते थे। ‘केसरी’ के प्रथम अंक के प्रकाशन के बाद खुद तिलक ने घर-घर जाकर इसकी प्रतियाँ ग्राहकों को पहुँचायी थी।
कोल्हापुर काँड़ (बरवै मानहानि केस) और तिलक की पहली जेल यात्रा
‘केसरी’ और ‘मराठा’ दोनों पत्रों के संस्थापक स्पष्टवादी और निर्भीक थे। ये दोनों ही इन पत्रों के माध्यम से सरकार की नीतियों और देश की वर्तमान परिस्थितियों पर सीधे कटाक्ष करके लेख लिखे जाते थे। इसके ग्राहकों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ने लगी। समाचार पत्रों की लोकप्रियता के साथ-साथ तिलक की भी लोकप्रियता बढ़ने लगी। लोगों को भी ये विश्वास हो गया कि ये लोग न केवल समाज सुधारक है बल्कि देश भक्त भी है।
‘केसरी’ और ‘मराठा’ दोनों पत्रों में देशी रियासतों के प्रबंध के बारे में बराबर लिखा जाता था। इसका कारण ये था कि इन देशी रियासतों को स्वतंत्रता और परंपरा का संरक्षक समझा जाता था। पत्रिका के सम्पादकों की लेखनी ब्रिटिश सरकार के लिये तीखी रहती थी। इस सन्दर्भ को 24 अप्रैल 1881 में प्रकाशित एक लेख स्पष्ट करता है:
“इतिहास के छात्रों की तेज नजर ने देश में अंग्रेजों के बढ़ते हुये कदम तथा देशी युवराजों के साथ दुर्व्यवहार को अच्छी तरह से जान लिया है। वो जान गये हैं कि सरकार उन पर हावी रहती है और उन्हें आश्रित (मातहत, दास) बना लिया है।”
कोल्हापुर का राजा राजाराम यूरोप घूमने गया था और 1870 में उसकी इटली मृत्यु हो गयी थी। उसकी रानियों ने गोद लिये पुत्र शिवाजीराम को गद्दी पर बैठा दिया। 1877 में वो कुछ पागलों की तरह हरकत करने लगा। कहा जाता है कि उसे पागल बनाने के लिये धोखे से दवाईयाँ दी जाती थी। इस कार्य को राज्य का दीवान रावबहादुर महादेव वासुदेव बरवै राजकुमार की सौतेली माँ की मदद से करता था।
इस घटना को जन साधारण की नजर में लाने के लिये मराठा और केसरी दोनों में लेख लिखे जाते थे। 27 नवम्बर 1881 को मराठा पत्रिका में युवा महाराज को “हैमलेट” और बरवै को “क्लोडियस” कहते हुये एक लेख लिखा। जिसमें कहा गया कि युवराज के दोनों संरक्षक उसे पागल घोषित करके राजगद्दी हड़पने का षड़यंत्र कर रहे हैं। इस समाचार से पूरे महाराष्ट्र में सनसनी फैल गयी। इसी बीच तिलक और आगरकर को इससे संबंधित 3 पत्र प्राप्त हुये, जिन्हें बरवै द्वारा लिखित बताया गया था। इन पत्रों में शिवाजी को जहर देने का वर्णन था।
तिलक ने इन पत्रों को मराठा और केसरी दोनों पत्रों में छपवा दिया। इस समाचार के छपते ही रावबहादुर को अपनी स्थिति खतरे में महसूस हुई और उसने इन पत्रों के सम्पादकों पर मानहानि का केस कर दिया। इस केस की सुनवायी मैजिस्ट्रेट मि.बेव की अदालत में हुई। जस्टिश लेथम ने जूरी की सलाह पर इन्हें अपराधी घोषित करके इन दोनों को 17 जुलाई 1881 को 4-4 महीने की सामान्य कैद की सजा सुना दी।
सजा के बाद गंगाधर तिलक और आगरकर को डोंगरी जेल में डाल दिया गया। इस जेल में इनके साथ अपराधियों वाला व्यवहार किया गया। 25 दिन तक इन्हें कुछ भी पढ़ने लिखने के लिये सुविधायें नहीं दी गयी। इस मुकदमें ने लोगों को तिलक के समर्थन में कर दिया। लोगों के मन में इनके लिये श्रद्धा और अधिक बढ़ गयी। 26 अक्टूबर 1882 को 4 महीने की सजा पूरी करने के बाद जब ये रिहा हुये तो इनका स्वागत करने के लिये 2000 लोग उपस्थित थे।
डेक्कन एजुकेशन सोसायटी से इस्तीफा
तिलक ने अपने साथियों के साथ न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना ही देशसेवा के उद्देश्य से की थी। तिलक और इनके सहयोगियों का उद्देश्य शिक्षा को उदार बनाकर देशवासियों के अनुकूल बनाना था ताकि देश के युवाओं को एक बेहतर दिशा दे सके। इन्होंने निश्चय कर लिया था कि ये सब किसी भी अन्य साधन को अपनी आय का माध्यम नहीं बनायेगें।
1885 में डेक्कन एजुकेशन सोसायटी की स्थापना करके एक नये कॉलेज फर्ग्यूसन कॉलेज की भी स्थापना कर दी गयी। कोल्हापुर केस के बाद ‘केसरी’ ‘मराठा’ दोनो पत्रिकाओं की लोकप्रियता भी बढ़ गयी। कोल्हापुर के नये राजा से समिति के संबंध अच्छे हो गये थे अतः नये कॉलेज की स्थापाना के लिये यहाँ से भी बहुत अर्थिक सहायता प्राप्त हुई। चिपलूणकर की मृत्यु (1882) के बाद समिति को बहुत ज्यादा हानि पहुँची। कॉलेज की स्थापना के बाद समिति के आन्तरिक मतभेद दिखाई देने लगे थे। 1885-86 में ये मतभेद बड़े विवाद में बदल गये और इन्हीं मतभेदों के कारण तिलक ने 14 अक्टूबर 1890 को समिति से त्यागपत्र दे दिया।
सोसायटी से मतभेद के कारण
तिलक ने अपने सहयोगियों के साथ स्कूल की स्थापना आत्मत्याग और देश सेवा की भावना से की थी। इस समिति ने निर्णय लिया था कि कभी भी खुद के लिये लाभ हो इस धारण से कोई भी सदस्य कार्य नहीं करेगा। 1882 में चिपलूणकर की मृत्यु के बाद समिति के अन्य सदस्यों में त्याग की वो भावना नहीं रही जो न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना के समय थी। लेकिन तिलक अपने बनाये हुये सिद्धान्तों पर अटल थे।
पहले मतभेद का कारण ‘केसरी’ और ‘मराठा’ थे। समिति के अन्य सदस्यों का मत था कि इन पत्रों से समिति के कार्यों में बाधा पड़ती हैं अतः इनकी व्यवस्था अलग से करनी चाहिये। दूसरे जब कॉलेज की स्थापना के बाद समिति में नये सदस्यों का प्रवेश हुआ तो वो अधिक सुविधाओं की माँग करने लगे। तिलक का मत था कि शिक्षा समिति के सदस्यों द्वारा लिखी गयी पुस्तकों की आय पर समिति का ही अधिकार होना चाहिये जबकि गोखले और आगरकर ये अधिकार लेखक को देना चाहते थे। समिति में गोखले की बात को रखा गया और पुस्तक की आय पर लेखक का अधिकार होने का निर्णय समिति ने लिया।
बाल गंगाधर तिलक को लगा कि समिति त्याग की भावना से कार्य नहीं कर रही है। ये समिति के सदस्यों को स्वार्थ की पूर्ति के लिये कार्य करते हुये नहीं देख सकते थे। अतः 14 अक्टूबर 1890 को समिति से त्यागपत्र देकर स्वंय को पूरी तरह से संस्था से अलग कर लिया।
‘केसरी’ और ‘मराठा’ पत्रिकाओं का सम्पादन
डेक्कन एजुकेशन सोसायटी से मतभेद हो जाने के कारण तिलक ने समिति से अपने सारे संबंध तोड़ लिये। इसके बाद आगरकर ने ‘केसरी’ पत्र का संपादन कार्य बन्द कर दिया। आगरकर द्वारा केसरी का सम्पादन छोड़ने पर दोनों पत्रों के सम्पादन की जिम्मेदारी तिलक पर आ गयी। कोल्हापुर केस के कारण इन दोनों पत्रों पर 7000 रुपये का ऋण थी जिसकी क्षतिपूर्ति भी तिलक को करनी थी। इन दोनों पत्रों की आय बहुत ज्यादा नहीं थी अतः तिलक को आय को नया साधन खोजने पड़े।
इन्होंने अपनी आय के लिये हैदराबाद (लाठूर) में रुई ओटने का कारखाना खोला। इसके साथ ही ये कानून की क्लास भी देते थे। 1896 से एन.सी.केलकर ने मराठा के सम्पादन में सहयोग देने लगे। इनका भतीजा इनके रुई ओटने के कारखाने में हाथ बंटाता था। इस तरह धीरे-धीरे तिलक अपने जीवन को फिर से पटरी पर ले आये।
नारी शिक्षा पर तिलक के विचार और ब्रिटिश शासन के लिये तीन सूत्रीय कार्यक्रम
तिलक के नारी शिक्षा के समर्थक थे। ये नारी शिक्षा पर अलग से केसरी और मराठा दोनों पत्रों के संपादकीय लेख में अपने विचारों को लिखते थे। ये भारतीय नारियों को शिक्षित करना चाहते थे लेकिन ब्रिटिश पद्धति के आधार पर नहीं। इनका मानना था कि किसी भी समाज में नारी का शिक्षित होना बहुत आवश्यक है क्योंकि एक शिक्षित नारी राष्ट्र के स्वरुप के परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करती है। इसके साथ ही इनका मानना था कि लड़कियों के लिये शिक्षा का अलग ढंग होना चाहिये, न कि अंग्रेजी ढंग।
बाल गंगाधर तिलक का मानना था कि भारत में स्त्रियों की दशा दूसरे देशों की स्त्रियों से भिन्न है। हमारी संस्कृति में भी स्त्रियों को एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है। इसलिये इनकी शिक्षा का पाठ्यक्रम और कार्यक्रम भी भिन्न होना चाहिये। तिलक ने स्त्री शिक्षा का कभी विरोध नहीं किया बल्कि अंग्रेजी ढंग से स्त्रियों को शिक्षित करने पर प्रश्न उठाया। इन्होंने स्कूल के 6 घंटों के अध्ययन समय पर भी एतराज किया। इनके अनुसार लड़कियों के लिये स्कूल में अध्ययन समय आधा होना चाहिये जिस से कि वो आधे समय पढ़ाई करके अपने घर-परिवार की देखरेख कर सकें।
तिलक ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ तीन सूत्रिय कार्यक्रम की वकालात की। जिसमें विदेशी कपड़ो, विदेशी उद्योगो और विदेशी शिक्षा के बहिष्कार के साथ ही स्वदेशी कपड़ो, उद्योगों और राष्ट्रीय शिक्षा को बढ़ावा देने पर जोर दिया। तिलक ने मराठा में प्रकाशित एक लेख में स्पष्ट किया कि देश की आधी से ज्यादा पूँजी विदेशों से चीजें खरीदने में खर्च कर दी जाती हैं। इसके स्थान पर यदि भारत में ही उद्योगों का विकास करने में एक बार ये पूँजी खर्च की जाये तो इससे लम्बे समय तक देश को फायदा होगा और देश के विकास का मार्ग प्रशस्त होगा। राष्ट्र के विकास के लिये तिलक ने जो विचार केसरी और मराठा पत्रों में दिये उन्होंने इन्हें एक शिक्षक से राजनेता बना दिया।
सामाजिक संघर्ष (क्राफर्ड और रमाबाई केस)
डेक्कन सोसायटी से अलग होने के बाद तिलक पूरी तरह से समाज सुधार के कार्यों में लग गये। ये दोनों पत्रों (केसरी और मराठा) में समाज की बुराईयों पर खुले तौर पर लिखते थे। इस बीच इन्होंने एक तहसीलदारों के पक्ष में एक केस लड़ा जिससे ये एक सफल वकील के रुप में प्रसिद्ध हो गये।
आर्थर ट्रेर्क्स क्राफर्ड पर रिश्वत का केस
आर्थर ट्रेर्क्स क्राफर्ड रत्नागिरी में कलक्टर था। वो किसी भी काम को करने के लिये तहसीलदारों से रिश्वत लेता था उसके बाद ही कार्य करता था। उसके व्यवहार से परेशान होकर लोगों ने उसके खिलाफ जब शिकायत की तो उसके विरुद्ध मुकदमा चलाने के लिये तहसीलदारों की सहायता लेने का निश्चय किया गया। साथ ही जांच अधिकारी को ये अधिकार दिया गया कि वो सहायता देने वाले तहसीलदारों को क्षमा भी कर सकता है। लेकिन सरकार के इस अधिकार पर दो पक्ष हो गये। एक पक्ष मानता था कि सहायक तहसीलदारों को भी फसा देना चाहिये दूसरे पक्ष का मानना था कि ऐसा करना गलत होगा। इसी दूसरे मत के समर्थन में तिलक भी थे।
क्राफर्ड पर आरोप सिद्ध होने के बाद इसे पद से हटा दिया गया और इसके सहायक हनुमन्तराव इनामदार (कर्नाटक) को 2 साल की सजा और 2000 रुपये के आर्थिक दंड़ की सजा दी गयी। निर्णय के कुछ दिन बाद क्राफर्ड लापता हो गया। बाद में इसे बम्बई में गिरफ्तार कर लिया गया। यहाँ इस पर मुकदमा न चलाकर आयोग बिठाया जिसने इसे दोषमुक्त कर दिया। बम्बई सरकार की नजरों में ये अपराधी था। अतः ये मामला भारत सचिव के पास पहुँचा जहाँ आयोग के फैसले को सही बताया लेकिन इसे नौकरी से हटा दिया। भारत सचिव के इस फैसले पर तहसीलदारों के विषय पर प्रश्न उठा जिन्होंने इसे रिश्वत देना स्वीकार किया था।
तिलक चाहते थे कि तहसीलदारों को क्षमा दी जाये। इसके लिये 1889 में एक सभा हुई जिसमें तिलक, रानाडे आदि वकीलों ने भाग लिया। तिलक ने इनके पक्ष में ब्रिटेन के 1725 के केस का उदाहरण भी दिया। इंग्लैण्ड में 1725 में एक गवर्नर ने 50 हजार की रिश्वत लेकर कुछ पदों पर नियुक्तियाँ करायी थी। उस मुकदमें के दौरान गवाहों को सुरक्षित करने के लिये संसद ने नया कानून बनाया था। तहसीलदारों का पक्ष रखते हुये तिलक ने ये उदाहरण प्रस्तुत किया। तिलक के अथक प्रयासों के कारण सरकार को इनकी बात माननी पड़ी और जिन तहसीलदारों ने मजबूरी या जबदस्ती में रिश्वत दी थी उन्हें माफ कर दिया गया और जिन्होंने अपनी मर्जी से रिश्वत दी थी उन्हें पद मुक्त कर दिया गया। इस केस के बाद तिलक एक वकील के रुप में प्रसिद्ध हो गये।

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