स्वामी दयानन्द सरस्वती
“वेदों की ओर लौटो”
-स्वामी दयानन्द
सरस्वती

समाज में फैले कुरीतियों ,बाह्य आडम्बरों तथा भेदभाव आदि को दूर करने
वाले स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी 1824 को टंकारा ,गुजरात में हुआ था. स्वामी
दयानंद सरस्वती हमेशा वेदों के पक्षधर रहे. स्वामी जी ने समाज को एकता के सूत्र में
बांधने के लिए आर्य समाज की स्थापना की .उनका अनेक धर्म के अनुयायी भी सम्मान करते
थे.उन्होंन मुस्लिम, ईसाई यहां तक कि हिन्दू पंडितो को भी अपने तर्क से मात दी. उन्होंने कुरान बाईबिल आदि का विस्तृत
अध्ययन कर सत्यार्थ प्रकाश नाम की पुस्तक की रचना की.उन्होंने समाज को वेद का उदाहरण देते हुए समझाया तथा उनके अंदर व्याप्त बुराईयों को दूर किया.
जीवन-परिचय
गुजरात के टंकारा में एक दिव्य तेजस्वी बालक का जन्म हुआ.मूल राशि में
पैदा होने के कारण इनका नाम मूलशंकर रखा गया.इनकी माता का नाम अमृतबाई तथा पिता का
नाम अंबाशंकर तिवारी था.इनका जन्म एक ब्राह्मण कुल में हुआ था.बचपन में ही मूल
शंकर बड़े ही कुशाग्र बुद्धि के थे.वेदों के कुछ अंश इनको बचपन में ही कंठस्थ हो
गये थे.बचपन में वे भगवान शंकर की पूजा करते थे. भगवान शंकर के प्रति उनका झुकाव
ज्याद था.
एक घटना ने बदल थी सोच
एक बार शिवरात्रि के दिन अपने परिवार के अन्य सदस्यों को देखकर ये भी
उपवास रखे. मंदिर में वे पूजा कर रहे थे
तभी अचानक उनकी नजर शिवलिंग पर पड़ी.उन्होंने देखा कि एक चूहा भगवान शंकर के ऊपर
रखे नैवेद्य को खा रही थी तभी से उनका विश्वास मूर्ति पूजा से उठ गया.
संन्यासी जीवन
स्वामी जी के सन्यास लेने के पीछे तीन मुख्य वजह मानी जाती है.पहली
शिवरात्रि के दिन चूहे का भगवान का प्रसाद
खाना दूसरा अपनी बहन की आकस्मिक मृत्यु
तथा तीसरा पिता जी के द्वारा शादी करने का दबाव बनाना.
इन सबसे स्वामी जी का मन संन्यास के प्रति आशक्त हुआ और ये 21 वर्ष की
उम्र में घर से भाग गये.घर से भागने पर ये अनेक संतों के संपर्क में आये और उनसे शिक्षा प्राप्त किये
स्वामी जी नें मथुरा में जाकर विरजानन्द जी को अपना गुरु बनाया और
उनसे संन्यासी दीक्षा ग्रहण की तथा वैदिक साहित्य की शिक्षा ग्रहण की . शिक्षा
पूरी होने के बाद गुरु विरजानन्द जी ने उनसे कहा,“मै चाहता हूं कि तुम संसार में जाकर
मनुष्यों में ज्ञान की ज्योति फैलाओ” .गुरु का यह कथन सुनकर वे सांसारिक भ्रमण में निकल
पड़े और पूरे संसार को वैदिक शिक्षा
दी.उन्होंने कर्मकाण्ड ,अंधविश्वास तथा ढोंग पर करारा प्रहार किया. उनका
कहना था कि यदि गंगा नहाने से ,सिर मुंड़ाने से और भभूत मलन से स्वर्ग मिलता, तो
मछली ,भेड़ और गधा स्वर्ग के पहले अधिकारी होते.
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने 1875 में चैत्र नवरात्र के दिन मुंबई मं
आर्य समाज की स्थापना की.कुछ ही समय बाद पूरे देश में इसकी कई शाखायें खुल गई. आर्य
समाज की स्थापना के साथ ही उन्होंने हिंदी मे धर्मग्रन्थों की रचना प्रारम्भ की
.स्वामी जी गुजराती थे मगर हिन्दी भाषा के प्रबल समर्थक थे.
एक ऐसा सपना जो क्या कभी पूरा हो पायेगा?
स्वामी जी ने अपने विचारों को आम जनता तक पहुंचाने के लिए हिंदी भाषा
को चुना.उन्होंने हिंदी भाषा में प्रसिद्ध सत्यार्थ प्रकाश की रचना की.उनका कहना
था, ‘मेरी आंखें उस दिन को
देखने के लिए तरस
रही हैं जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब भारतीय एक भाषा में बोलने औऱ समझने लग
जाएं’.
प्रमुख नेताओं के विचार

स्वामी जी के बारे में लौह पुरुष सरदार पटेल ने कहा था कि स्वतंत्रता
की नीव वास्तव में स्वामी दयानन्द ने डाली थी.पट्टाभि सीतारमैया का मानना था कि
गांधी जी राष्ट्रपिता हैं पर स्वामी द्यानन्द राष्ट्र पितामह थे.वहीं एनीबेसेंट का
कहना था कि स्वामी द्यानन्द ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ‘भारत भारतीयों के लिए है’ की घोषणा की.
स्वामी जी ने बाल विवाह , जाति-पांत ,भेद-भाव को दूर किया. वे नारी
शिक्षा तथा विधवा पुनर्विवाह के पक्षधर
थे. उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया.उन्होंने देश भ्रमण के दौरान
पाया कि लोगों में अंग्रेजी शासन के खिलाफ गुस्सा है बस उन्हे सही मार्गदर्शन की
जरुरत है.प्रसिद्ध क्रान्तिकारी तात्या टोपे,नाना साहेब पेशवा ,बाला साहेब आदि
इनके विचारों से प्रभावित थे.1857 की क्रांति विफल रही मगर वे निराश नही हुए.उनका
मानना था कि वर्षों से चली आ रही गुलामी एक आंदोलन से समाप्त नही होगी.इसके लिए
अभी भी उतना ही समय लग सकता है जितना अब तक गुलामी मे काटा गया है.
मृत्यु
अंग्रेजों ने स्वामी जी को कई बार जहर देने का प्रयास किया मगर वे हर
बार बच जाते.स्वामी जी 1883 में जोधपुर के महाराजा यशवंत सिंह के यहां
गये.उन्होंने देखा कि महाराज एक नर्तकी के प्यार में पड़ गये.स्वामी जी ने महाराज
को टोका और कहा कि एक तरफ आप धर्म से
जुड़ना चाहते हैं और दूसरी तरफ ये विलासिता.ऐसे में आपको ग्यान की प्राप्ति
मिलना नामुमकिन हैं.
स्वामी जी की बात सुनकर महाराज को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने
नर्तकी से रिश्ता खत्म कर लिया.नर्तकी यह देखकर स्वामी जी से जलने लगी औऱ
उन्हें मारने की योजना बनाने लगी.एक दिन
उसने रसोइया को अपनें साथ मिलाकर उनके भोजन में कांच के टुकड़े मिला दिया जिससे
स्वामी जी उस भोजन को खाने के बाद उनकी
हालत खराब हो गई .उन्हें तुरन्त अजमेर भेजा गया मगर 30 अक्टूबर 1883 को उनकी
मृत्यु हो गई. वैदिक धर्म का प्रचार प्रसार इन्होंने पूरे देश में किया.उन्होंने
देश में व्याप्त बुराईयों के खिलाफ लोगों
को जागरुक किया.उन्होंने कई पुस्तकों क
रचना की जिसमें कुछ निम्नलिखित
हैं-
-ऋग्वेद भाष्य
-संस्कारविधि
-वेदांगप्रकाश
-गोकरुणानिधि
-पंच महायज्ञविधि
-व्यवहार भानु
-यजुर्वेद भाष्य
लेखक-अच्युत द्विवेदी,लखनऊ
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