वासुदेव बलवंत फड़के
प्रसिद्ध क्रान्तिकारी व स्वतंत्रता सेनानी वासुदेव बलवंत फड़के का जन्म 4 नवम्बर 1845 को महाराष्ट्र में हुआ था. इन्होंने ही 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की विफलता के बाद पुन: लोगों में आजादी के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी थी.
वासुदेव बलवंत फड़के अपने बाल्यकाल से ही बड़े तेजस्वी और स्वस्थ शरीर
के बालक थे.उन्हें पर्वतों और वनों में घूमने का बड़ा शौक था. उनकी शिक्षा कल्याण
और पूना में हुई.वासुदेव के पिता चाहते थे कि ये पढ़ाई छोड़कर नौकरी कर लें .मगर इनका सपना पढ़ाई करना था.ये अपने पिता से
कहा करते थे ,‘मैं आगे भी पढ़ाई करुंगा’. पिता के नौकरी करने पर जोर देने पर ये घर छोड़कर
मुम्बई आ गए.इन्होंने मुम्बई में जी.आर.पी में बीस रुपये मासिक की नौकरी करना शुरु
कर दिये और अपनी पढ़ाई भी जारी रखी. इनकी पत्नी का 28 वर्ष की आयु में मृत्यु हो
गई जिसके बाद इन्होंने दूसरा विवाह किया.

अपने विद्यार्थी जीवन से ही वासुदेव 1857 ईसवी की क्रान्ति की विफलता
के बारे में सुन चुके थे.अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद ये ग्रेट इंडियन पेनिंसुला
रेलवे और मिलिट्री फाइनेंस डिपार्टमेंट पूना में नौकरी करना शुरु कर दिये.इन्होंने
जंगल में व्यायाम शाला भी बनाई जहां इनके साथ ज्योतिबा फुले भी थे.
महादेव गोविन्द रनाडे के भाषण ने इनको सबसे ज्यादा प्रभावित किया
.पूना में 1870 में आयोजित सार्वजिनक सभा के एक कार्यक्रम में रनाडे नें अपने भाषण
में अंग्रेजों के द्वारा भारत की आर्थिक लूट पर ज्यादा जोर दिया.
इस भाषण का फड़के के मन में गहरा असर पड़ा.वो अपनी नौकरी करने के
दौरान भी छुट्टी के दिनों में गांव –गांव घूमकर लोगों में इस लूट के विरोध में
प्रचार प्रसार करते रहे.
एक बार 1871 ईसवी में इनको एक तार मिला जिसमें इनकी माता के अस्वस्थता
के बारे में बताया गया था.तार में लिखा था कि तुम शीघ्र घर आ जाओ ,नहीं तो मां के
दर्शन भी तुम्हे शायद ही नसीब हो .इस तार को पढ़कर वो तुरन्त अंग्रेज अधिकारी के
पास अवकाश का प्रार्थना पत्र लेकर गये मगर अंग्रेजों ने इन्हे अवकाश नही
दिया.दूसरे दिन ये अपने घर चले आए मगर गांव पहुंचकर इन्हें गहरा आघात पहुंचा
.उन्होंने देखा कि उनकी मां उनके घऱ पहुंचने के पहले ही इस दुनिया को छोड़कर चल बसी
हैं.इस घटना का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा.उन्होंने पांव छूकर माता से क्षमा मांगी.अब
वे अंग्रेजी शासन के खिलाफ हो गये
वासुदेव बलवंत फड़के ने इस
घटना के बाद अंग्रेजों की नौकरी छोड़ दी और उनके खिलाफ क्रान्ति की तैयारी करने
लगे.उन्होंने फरवरी 1879 में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा कर
दी.इन्होंने धन इकट्ठा करने के लिए धनी सेठों के यहां डाका भी डाले.

इन्होंने पूरे महाराष्ट्र में
घूम घूमकर युवको को संगठित करने का प्रयास करने लगे.मगर कुछ ही समय बाद
इनका नवयुवकों से विश्वास उठ गया और अब ये वनवासी समूहों को संगठित करने का प्रयास
करने लगे.उनका मानना था कि जब भगवान श्रीराम वानरों की सहायता से लंका पर विजय
प्राप्त कर सकते हैं और महाराणा प्रताप वनवासियों को संगठित कर अकबर को हरा सकते हैं तथा शिवाजी उनमें स्वाभिमान भरकर
औरंगजेब को हरा सकते हैं तो मैं क्यों नही अंग्रेजी हुकूमत को हिला सकता हूं.
उनके बढ़ते प्रभाव को देखकर अंग्रेजों ने उन पर 50 हजार रुपये का ईनाम
घोषित कर दिया .उनको जिंदा या मुर्दा पकड़ने वाले को पचास हजार रुपये का ईनाम दिया
जायेगा.अंग्रेजों की इस घोषणा के दूसरे दिन बलवंत रात फड़के के हस्ताक्षर से
पोस्टर लगा दिये गये कि जो कोई भी अंग्रेज अफसर रिचर्ड का सिर काटकर लायेगा उसे 75
हजार रुपये का इनाम दिया जायेगा.अंग्रेजी हुकूमत उनके इस कदम से और भी ज्यादा
बौखला गई और उन्हें पकड़ने के लिए कोशिशें तेज कर दी
20 जुलाई 1879 को, बीमार होने पर वे मंदिर में आराम कर रहे थे तभी उन्हें
गिरफ्तार कर लिया गया और उनपर अंग्रेजों की तरफ से राजद्रोह का मुकदमा चला.अन्त
में उन्हें आजीवन कारावास की सजा पर अदन भेज दिया गया.अदन में ये एक दिन जेल से
भाग निकले मगर वहां के मार्गों से अपरिचित होने के कारण इनको दोबार पकड़ लिया गया
.अंग्रेजों ने इन्हें भीषण यातनाएं दी.अन्त में क्षय रोग के कारण 17 फरवरी 1883 को
इनकी मौत हो गई.
वासुदेव बलवंत फड़के ने जो अंग्रेजों के खिलाफ क्रान्ति की चिंगारी
जलाई थी वह आगे चलकर भीषण आग का रुप धारण किया और अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना
पड़ा.उनका जीवन देश के युवाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत का काम कर रही है.भारत माता का
यह अमर सपूत का नाम भारतीय इतिहास में अमर हो गया है.
रिपोर्ट-अच्युत द्विवेदी,लखनऊ
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